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| Narayan Kavach Lyrics in Hindi |
Narayan Kavach Lyrics
ॐ श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ नमो नारायणाय ।
अङ्गन्यासः
ॐ ॐ नमः पादयोः ।
ॐ नं नमः जानुनोः ।
ॐ मों नमः ऊर्वोः ।
ॐ नां नमः उदरे ।
ॐ रां नमः हृदि ।
ॐ यं नमः उरसि ।
ॐ णां नमः मुखे ।
ॐ यं नमः शिरसि ॥
करन्यासः
ॐ ॐ नमः दक्षिणतर्जन्याम् ।
ॐ नं नमः दक्षिणमध्यमायाम् ।
ॐ मों नमः दक्षिणानामिकायाम् ।
ॐ भं नमः दक्षिणकनिष्ठिकायाम् ।
ॐ गं नमः वामकनिष्ठिकायाम् ।
ॐ वं नमः वामानामिकायाम् ।
ॐ तें नमः वाममध्यमायाम् ।
ॐ वां नमः वामतर्जन्याम् ।
ॐ सुं नमः दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि ।
ॐ दें नमः दक्षिणांगुष्ठाय पर्वणि ।
ॐ वां नमः वामांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि ।
ॐ यं नमः वामांगुष्ठाय पर्वणि ॥
विष्णुषडक्षरन्यासः
ॐ ॐ नमः हृदये ।
ॐ विं नमः मूर्धनि ।
ॐ षं नमः भ्रुवोर्मध्ये ।
ॐ णं नमः शिखायाम् ।
ॐ वें नमः नेत्रयोः ।
ॐ नं नमः सर्वसन्धिषु ।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् आग्नेयाम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् नैरृत्ये ।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्रतीच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्ये ।
ॐ मः अस्त्राय फट् उदीच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऐशान्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऊर्ध्वायाम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् अधरायाम् ॥
अथ श्रीनारायणकवचम् ।
राजोवाच ।
यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥ १॥
भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥ २॥
श्रीशुक उवाच ।
वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥ ३॥
विश्वरूप उवाच ।
धौताण्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदण्मुखः ।
कृतस्वाण्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥ ४॥
नारायणमयं वर्म सन्नह्येद्भय आगते ।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥ ५॥
मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥ ६॥
करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमण्गुल्यण्गुष्ठपर्वसु ॥ ७॥
न्यसेद्धृदय ॐकारं विकारमनु मूर्धनि ।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ॥ ८॥
वेकारं नेत्रयोर्युJण्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ॥ ९॥
सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
ॐ विष्णवे नम इति ॥ १०॥
आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ ११॥
ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताण्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥ १२॥
जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥ १३॥
दुर्गेष्वटव्याजिमुखादिषु प्रभुः
पायान्नृसिंहोऽसुरयूथपारिः ।
विमुJण्चतो यस्य महाट्टहासं
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥ १४॥
रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः ।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥ १५॥
मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात् ।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥ १६॥
सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् ।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७॥
धन्वन्तरिर्भगवान्पात्वपथ्या-
द्द्वन्द्वाद्भयादृषभो निर्जितात्मा ।
यज्ञश्च लोकादवताJण्जनान्ता-
द्बलो गणात्क्रोधवशादहीन्द्रः ॥ १८॥
द्वैपायनो भगवानप्रबोधा-
द्बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात् ।
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतारः ॥ १९॥
मां केशवो गदया प्रातरव्या-
द्गोविन्द आसण्गवमात्तवेणुः ।
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥ २०॥
देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा
सायं त्रिधामावतु माधवो माम् ।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥ २१॥
श्रीवत्सधामापररात्र ईशः
प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः ।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते
विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥ २२॥
चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम् ।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥ २३॥
गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिण्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥ २४॥
त्वं यातुधानप्रमथप्रेतमातृ-
पिशाचविप्रग्रहघोरदृष्टीन् ।
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो
भीमस्वनोऽरेहृ।र्दयानि कम्पयन् ॥ २५॥
त्वं तिग्मधारासिवरारिसैन्य-
मीशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि ।
चक्षूंषि चर्मJण्छतचन्द्र छादय
द्विषामघोनां हर पापचक्षुषाम् ॥ २६॥
यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च ।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य वा ॥ २७ ॥
सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात् ।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ॥ २८॥
गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः ।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥ २९ ॥
सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः ।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ॥ ३०॥
यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१॥
यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् ।
भूषणायुधलिण्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२॥
तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३॥
विदिक्षु दिक्षूर्ध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बहिर्भगवान्नारसिंहः ।
प्रहापयं।cलोकभयं स्वनेन
स्वतेजसा ग्रस्तसमस्ततेजाः ॥ ३४॥
मघवन्निदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम् ।
विजेष्यस्यJण्जसा येन दंशितोऽसुरयूथपान् ॥ ३५॥
एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ॥ ३६॥
न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७॥
इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन् द्विजः ।
योगधारणया स्वाण्गं जहौ स मरुधन्वनि ॥ ३८॥
तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा ।
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ॥ ३९ ॥
गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्षिराः ।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः ।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥ ४०॥
श्रीशुक उवाच ।
य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः ।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥ ४१॥
एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ॥ ४२॥
॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
षष्ठस्कन्धे नारायणवर्मकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥
Narayan Kavach क्या है?
Narayan Kavach भगवान श्रीहरि विष्णु की दिव्य रक्षा स्तुति है, जिसका वर्णन श्रीमद्भागवत महापुराण (षष्ठ स्कंध) में मिलता है। यह एक आध्यात्मिक कवच माना जाता है जो साधक को भय, नकारात्मक शक्तियों, मानसिक अशांति तथा जीवन की अनेक कठिन परिस्थितियों से रक्षा प्रदान करने की प्रार्थना करता है।
हिंदू धर्म में अनेक भक्त नियमित रूप से नारायण कवच का पाठ करते हैं क्योंकि इसे भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त करने का एक प्रभावशाली माध्यम माना जाता है।
Narayan Kavach का महत्व
नारायण कवच केवल एक स्तोत्र नहीं बल्कि भगवान विष्णु की शरण में जाने का प्रतीक है। इसका नियमित पाठ भक्त के मन में विश्वास, साहस और सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न करता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार इसका श्रद्धापूर्वक पाठ करने से व्यक्ति अपने जीवन में आने वाली अनेक बाधाओं का धैर्यपूर्वक सामना कर पाता है।
Narayan Kavach का अर्थ
'कवच' का अर्थ होता है रक्षा कवच। इस स्तोत्र में भगवान श्रीहरि के विभिन्न दिव्य स्वरूपों का स्मरण करते हुए उनसे जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सुरक्षा और कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
यह केवल बाहरी सुरक्षा की नहीं बल्कि मन, बुद्धि और आत्मबल की भी रक्षा का संदेश देता है।
Narayan Kavach पाठ करने के लाभ
नियमित श्रद्धापूर्वक पाठ करने से निम्न आध्यात्मिक लाभ बताए जाते हैं—
- भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने की भावना मजबूत होती है।
- मन को शांति और सकारात्मक ऊर्जा मिलती है।
- भय एवं मानसिक तनाव कम करने में सहायता मिल सकती है।
- आत्मविश्वास और धैर्य बढ़ाने में प्रेरणा मिलती है।
- कठिन परिस्थितियों का सामना करने की शक्ति विकसित होती है।
- नियमित भक्ति एवं ध्यान की आदत बनती है।
नोट: धार्मिक लाभ आस्था पर आधारित हैं और इन्हें व्यक्तिगत अनुभव के रूप में देखा जाना चाहिए।
Narayan Kavach कब पढ़ना चाहिए?
आप निम्न अवसरों पर इसका पाठ कर सकते हैं—
- प्रतिदिन प्रातःकाल
- गुरुवार एवं एकादशी
- भगवान विष्णु की पूजा के समय
- किसी महत्वपूर्ण कार्य से पहले
- मानसिक अशांति या भय की स्थिति में
- विशेष धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान
Narayan Kavach पढ़ने की विधि
- स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान विष्णु या श्री नारायण की प्रतिमा अथवा चित्र के सामने दीपक जलाएं।
- शांत मन से भगवान का ध्यान करें।
- श्रद्धा और एकाग्रता के साथ नारायण कवच का पाठ करें।
- अंत में भगवान से परिवार और समस्त संसार के कल्याण की प्रार्थना करें।
Narayan Kavach से जुड़ी रोचक बातें
- इसका उल्लेख श्रीमद्भागवत महापुराण में मिलता है।
- इसे भगवान विष्णु की दिव्य रक्षा स्तुति माना जाता है।
- अनेक वैष्णव परंपराओं में इसका विशेष महत्व है।
- भक्त इसे आध्यात्मिक सुरक्षा का प्रतीक मानते हैं।
- नियमित पाठ भक्ति और आत्मविश्वास दोनों को मजबूत करता है।
FAQs
Narayan Kavach किसने बताया था?
श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार इसका उपदेश महर्षि विश्वरूप द्वारा दिया गया था।
क्या Narayan Kavach रोज पढ़ सकते हैं?
हाँ, श्रद्धा और नियमपूर्वक इसका दैनिक पाठ किया जा सकता है।
क्या महिलाएँ Narayan Kavach पढ़ सकती हैं?
हाँ, श्रद्धा और भक्ति के साथ कोई भी इसका पाठ कर सकता है।
Narayan Kavach किस भगवान का स्तोत्र है?
यह भगवान श्रीहरि विष्णु (नारायण) को समर्पित दिव्य रक्षा स्तोत्र है।
क्या Narayan Kavach का पाठ सुबह करना चाहिए?
सुबह का समय श्रेष्ठ माना जाता है, हालांकि श्रद्धा से किसी भी समय इसका पाठ किया जा सकता है।
निष्कर्ष
Narayan Kavach भगवान श्रीहरि विष्णु की दिव्य शरण और सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। इसका नियमित एवं श्रद्धापूर्वक पाठ भक्त के मन में आत्मविश्वास, सकारात्मकता और आध्यात्मिक शांति का संचार करता है। यदि आप भगवान विष्णु की उपासना करते हैं, तो यह स्तोत्र आपकी दैनिक साधना का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
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